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जिंदगी रूठ रही है हमसे

लगता है जिंदगी रूठ रही है हमसे
न तनहाई भांती है, न गम सताता है
...
या शायद मैने पा लिया है तुमको?

जख्म

जिंदा होने का एहसास दिलाते है ज़ख्म
फिर जीने का कोइ बहाना बन जाते है ज़ख्म!

जी उठती हूं फिरसे जब कुरेदती हूं इन्हे
हर सुबह बनते है नये, और शाम पुराने से ज़ख्म!

चिंगारी सी जलन,तपती धूप सी अगन इनमे
ठहरे पानी से है फिर भी क्यू सुलगते है ज़ख्म!

संभाले है न जाने कितनी मुद्दतोंसे मैने
मिलो तो बताऊं के है तुमसे भी प्यारे अब ये ज़ख्म!